ठोकरो को खाकर वापस सफ़र तय करते देखा है; सबको अपनी मंजिल तक उसे पहुचाते देखा है; सैकड़ो मील का सफ़र तय करके वही रोज उसे उसी जगह देखा है; हजारो की जान ले चूका होगा उसको मैंने सदैव शांत देखा है; मेरे जैसे लाखो लोग जिसे रोज देखते है, वही चंद्रमा की अठखेलियो पर नाचते हुए उसकी लहरों को सबने देखा है! हाँ, उस अचल, दृढ, कोमल, शांत, शीतल समुन्द्र को मैंने देखा है! उसकी चंचल स्थिरता को देखकर मन विचलित सा जान पड़ा और लोकल बस से उतारकर तट के किनारे, सूर्य की पर्याप्त किरणों की चाव में घंटो का समय मैंने कुछ क्षणों में व्यतीत कर दिया!
आँखों के सामने तट के किनारे खेल रहे बालक को मैंने आवाज देकर कहा किनारे पर मत जाना डूब जाओगे! अचानक समय रूपी रथ भूतकाल में गया और किशोर अंकल की आवाज कानो पर पड़ी "किनारे पर मत जाना डूब जाओगे"!
किशोर अंकल को अत्यंत कठोरे समझ मैंने किनारा छोड़ दिया! वैसी ही भावना मुझे तट पर खेल रहे उस बालक में दिखी जिसने मुझे मेरे बचपन और किशोरे अंकल की याद दुरुस्त करा दी थी! वाकई बचपन का एहसास सोहार्दपूर्ण होता है जो हम सभी अपने जीवन के किसी न किसी वक़्त पर महसूस करते है! हम सोचते रहते है की अगर हम बच्चे होते तो यह होता या फिर वो हो जाता, वाकई बचपन में बिताये गए दिन भूले नहीं भूले जाते!
वाणी, प्रिंस, गजेन्द्र, अरुण, ललित; अरे पड़ोस की वो ललानी आंटी जिनके घर पर क्रिकेट की गेंद जाती थी तो बस इस बात पर ही डांट पड़ती थी की गेंद उनके सर पर लगी है! क्या दिन थे वो भी! काश! काश! काश! मैं बच्चा ही रहता तो पैसा कमाई फोर्मलिटी शादी नौकरी बिल, न जाने कितनी समस्याओ से दूर रह मजे कर रहा होता! यह पाबन्दी....
बैठे बैठे 3 घंटे हो गए थे! समय का पता भी न चला, पता चला तो बस पाबन्दी का जो बचपन में
किशोर अंकल ने मुझ पर लगायी थी और मैंने उस बालक पर! वाकई पाबन्दी पर सोचा तो एहसास हुआ की बड़ा मैं खुद हुआ हूँ! मैं आज भी उस बच्चे के साथ किनारे पर खेल सकता था पर नहीं मुझे तो बड़ा होना था,
किशोर अंकल बनना था! वाह री दुनिया तेरा ढान्दस बाँधने के लिए बड़ा होना पड़ता है! वैसे तो बचपन के दिन अच्छे लगते है पर सच पूछो तो दिल के कही कोने में अब बचपन भी बचपना सा लगता है!
समय वाकई तेजी से बीत रहा है! मैं घड़ी की बात कर रहा हूँ, मुझे चार घंटे हो गए है और पास में वो माँ अपने बेटे को सुलाने की कोशिश कर रही है! क्या उस माँ को भी वही लोरिया याद होगी जो उसको उसकी माँ ने बचपन में सुनाई थी? अपने बच्चे के बाल्यपन को देखकर क्या उसकी आँख नाम न होती होगी? क्या वो अपनी बचपन की सखी रुची, गुरप्रीत, और आँचल को याद न करती होगी! अवश्य ही करती होगी तभी तो दुनिया से बेखबर निहार-निहार के अपने बच्चे को सुला रही है!
समुद्र तट पर दूर-दूर से बहती हुई चीज़े आती है और न जाने कैसे कैसे ख्याल अपने साथ लेकर आती है! अब इस कमल के फूल को ही ले लो जो मेरे पाँव से टकराया! शायद यह भी कली बनकर खुश रहता पर इस संसार में महत्व तो खिले फूलो का ही है! तभी दूर खड़े वृक्ष ने भी आभास कराया की यदि वो पौधा ही रह जाता तो शायद चिड़िया अपने बच्चे सिर्फ मेरी रसोई में बने घोसले में ही देती, जिस घोसले को मैं हर महीने साफ़ कर देता! फलस्वरूप वह अपने बच्चे का पालन पोषण सही से ना कर पाती!
शाम ढल चुकी थी, समुद्र अभी भी मथ रहा था, विचारो को! एक और जहा बच्चा,किशोर अंकल और माँ बाल्य होने पर मजबूर कर रहे थे; वही कमल और वृक्ष ने मेरी जिम्मेदारी को महत्त्वपूर्ण सिद्ध कर दिया था! समुद्र तट पर इन सबके बीच में चिड़िया खड़ी थी और उसे अपना आदर्श मान मैंने समुद्र को चंद्रमा के इशारे पर बड़े होते हुए देखा और बस नंबर 621 पकड़ कर घर की ओर हो गया ताकि अपना घोसला संभल सकू!

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